Raipur Corporation Controversy: सभापति सूर्यकांत राठौर बोले- अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के ईगो से रायपुर को हो रहा नुकसान, 25 साल के कार्यकाल में पहली बार अराजकता जैसी स्थिति

रायपुर नगर निगम में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच खींचतान पर सभापति ने जताई चिंता
रायपुर। राज्य की राजधानी और प्रदेश के सबसे बड़े नगर निगम में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच चल रही खींचतान अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गई है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 15 अगस्त को नगर निगम मुख्यालय में आयोजित ध्वजारोहण समारोह के दौरान सभापति सूर्यकांत राठौर ने मंच से अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ते मतभेदों पर खुलकर चिंता जताई।
सभापति ने कहा कि रायपुर को अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के ईगो से नुकसान हो रहा है। उन्होंने अपने 25 साल के नगर निगम कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने पहले तीन बार कांग्रेस और दो बार भाजपा के शासनकाल में पार्षद, एमआईसी सदस्य और नेता प्रतिपक्ष के रूप में काम किया है, लेकिन ऐसी स्थिति उन्होंने पहले कभी नहीं देखी।
‘25 साल में पहली बार निगम में अराजकता की स्थिति’
सभापति सूर्यकांत राठौर ने कहा कि सभी लोग अपना-अपना ईगो लेकर बैठे हैं और इसका सीधा नुकसान शहर को हो रहा है। उन्होंने कहा कि उनके 25 साल के कार्यकाल में पहली बार नगर निगम में अराजकता जैसी स्थिति बनी है।
उन्होंने कहा कि निगम में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद बेहद जरूरी है। कई ऐसे मामले हैं जिन्हें बातचीत और आपसी समन्वय से आसानी से सुलझाया जा सकता है, लेकिन संवादहीनता के कारण विवाद थाने और अदालत तक पहुंच रहे हैं।सभापति ने पिछले कुछ महीनों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ अधिकारियों द्वारा थानों में एफआईआर दर्ज कराने की घटनाओं का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि विवाद को बढ़ाने के बजाय दोनों पक्षों को बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए।
“ताली दोनों हाथों से बजती है’
सूर्यकांत राठौर ने कहा कि “ताली दोनों हाथों से बजती है।” किसी का हाथ छोटा या बड़ा होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। नगर निगम लड़ाई के लिए नहीं, बल्कि जनता की सेवा और शहर के विकास के लिए है।उन्होंने कहा कि नगर निगम से आम आदमी से लेकर समाज के हर वर्ग का सीधा जुड़ाव है। ऐसे में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच विवाद का असर अंततः जनता पर ही पड़ता है। उन्होंने समन्वय की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि ईगो रखने से सबसे पहले खुद को ही नुकसान होता है।
पुराने कर्मचारियों को याद कर भावुक हुए सभापति
सभापति ने नगर निगम के सेवानिवृत्त अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी का जिक्र करते हुए कहा कि पुराने समय में कर्मचारी और अधिकारी निगम को अपने परिवार की तरह मानते थे। उनमें निगम के प्रति लगाव और जुड़ाव दिखाई देता था।
उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि अब वह लगाव और जुड़ाव कम होता दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि बात कहने की नहीं है, लेकिन अब बर्दाश्त नहीं हो रहा है।
स्वतंत्रता दिवस समारोह के मंच से सभापति की यह टिप्पणी वहां मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई।
महापौर बोलीं- लड़ाई नहीं, समन्वय की जरूरत
वहीं रायपुर नगर निगम की महापौर मीनल चौबे ने निगम में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच किसी तरह की लड़ाई होने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि नगर निगम में लड़ाई जैसी कोई स्थिति नहीं है। सभी लोग मिलकर काम कर रहे हैं, लेकिन बेहतर समन्वय की जरूरत जरूर है।
महापौर ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों, दोनों को अपनी भाषा में संयम रखने की आवश्यकता है। आपसी संवाद और समन्वय से ही शहर के विकास से जुड़े कामों को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है।
नेता प्रतिपक्ष ने किया सभापति के बयान का समर्थन
नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने भी सभापति सूर्यकांत राठौर के बयान का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि सभापति ने स्वतंत्रता दिवस के मंच से जो बात कही, वह उनके लंबे अनुभव पर आधारित है और वास्तविकता को सामने रखती है।उन्होंने कहा कि ईगो से सब कुछ बर्बाद हो रहा है। अधिकारी और जनप्रतिनिधि एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों को मिलकर काम करना होगा, तभी शहर का विकास संभव है।
आकाश तिवारी ने हाल के महीनों में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच सामने आए विवादों को निराशाजनक बताया। उन्होंने कहा कि सभापति ने जिस समन्वय के रास्ते पर चलने की बात कही है, उस पर सभी पक्षों को आगे बढ़ना चाहिए।
प्रदेश के सबसे बड़े निकाय में बढ़ा विवाद चर्चा का विषय
रायपुर नगर निगम प्रदेश का सबसे बड़ा नगर निकाय है। यहां होने वाली गतिविधियों और निगम की कार्यप्रणाली का असर प्रदेश के दूसरे नगरीय निकायों पर भी पड़ता है। ऐसे में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ता तनाव चिंता का विषय माना जा रहा है।एक ओर सभापति 25 साल के अनुभव का हवाला देकर निगम में अराजकता जैसी स्थिति बनने की बात कह रहे हैं, वहीं महापौर इसे लड़ाई न मानते हुए समन्वय की आवश्यकता बता रही हैं। दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष भी सभापति की बात का समर्थन करते हुए अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को मिलकर काम करने की जरूरत बता रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल- कैसे खत्म होगी खींचतान?
मौजूदा स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद और समन्वय की वह कड़ी दोबारा मजबूत हो पाएगी, जिसकी जरूरत खुद सभापति, महापौर और नेता प्रतिपक्ष ने स्वीकार की है।अगर आपसी मतभेद और संवादहीनता जारी रहती है और विवाद थाने व अदालत तक पहुंचते रहते हैं, तो इसका असर नगर निगम के कामकाज के साथ-साथ शहर के विकास और आम जनता की सुविधाओं पर भी पड़ सकता है।
स्वतंत्रता दिवस के मंच से सभापति सूर्यकांत राठौर का बयान इसी ओर इशारा करता है कि अब विवाद से ज्यादा जरूरत संवाद, समन्वय और सामूहिक जिम्मेदारी की है।




