साल में सिर्फ दशहरे पर खुलता है रायपुर का कंकाली मठ, नागा साधुओं की तपस्या से जुड़ा है इतिहास; आज सुबह से उमड़े श्रद्धालु

रायपुर। राजधानी रायपुर में हर साल विजयादशमी का पर्व एक अनूठी धार्मिक परंपरा का साक्षी बनता है, ब्राह्मणपारा स्थित ऐतिहासिक कंकाली मठ के पट आज दशहरे के अवसर पर खोले गए। सालभर बंद रहने वाले इस मठ में माता के दर्शन और प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों की पूजा के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। माता के दर्शन के लिए पहुंचे भक्तों में खास उत्साह देखने को मिला।
कंकाली मठ की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि नागा साधुओं की परंपरा, प्राचीन साधना स्थलों और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के कारण भी है। आखिर इस मठ के पट साल में केवल एक बार ही क्यों खुलते हैं? इसके पीछे क्या मान्यता है और कंकाली तालाब का इतिहास क्या है? जानिए इस विशेष रिपोर्ट में।

साल में एक दिन ही क्यों खुलते हैं मठ के पट?
कंकाली मठ से जुड़ी प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक समय मां कंकाली संन्यासियों से रुष्ट होकर वहां से चली गई थीं। बाद में संन्यासियों की आराधना से प्रसन्न होकर माता ने विजयादशमी के दिन विशेष रूप से विराजने का वचन दिया। मान्यता है कि तभी से दशहरे पर मठ के पट खोलने की परंपरा चली आ रही है।
यह कथा स्थानीय धार्मिक परंपरा के रूप में प्रचलित है। हालांकि, हर साल दशहरे पर मठ खुलने की परंपरा इस स्थान को रायपुर की विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करती है।
नागा साधुओं ने बसाया था साधना का केंद्र
कंकाली मठ का इतिहास नागा साधुओं और दशनामी संन्यासी परंपरा से जुड़ा बताया जाता है। विभिन्न प्रकाशित रिपोर्टों में मठ की स्थापना का समय 13वीं शताब्दी के आसपास बताया गया है, जबकि कुछ रिपोर्टें माता की प्रतिमा और मंदिर को लगभग 600 से 700 वर्ष पुराना बताती हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पुराने समय में यह क्षेत्र जंगल और श्मशान के आसपास था। नागा साधु यहां साधना और देवी की आराधना करते थे। मठ परिसर में साधुओं की समाधियां होने का उल्लेख भी प्रकाशित विवरणों में मिलता है। यही परंपरा इस स्थान को धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक महत्व भी देती है।

कंकाली तालाब का नाम कैसे पड़ा?
कंकाली मठ के इतिहास के साथ पास स्थित कंकाली तालाब का उल्लेख भी आता है। एक प्रचलित कथा के अनुसार, इस क्षेत्र में अंतिम संस्कार के बाद अवशेषों के विसर्जन और कंकालों से जुड़ी परंपराओं के कारण तालाब को कंकाली तालाब कहा जाने लगा। हालांकि, नामकरण की इस कथा को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि स्थानीय मान्यता के रूप में ही देखना चाहिए।
दशहरे पर होती है प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों की पूजा
कंकाली मठ की सबसे खास परंपराओं में प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों की पूजा शामिल है। प्रकाशित रिपोर्टों में तलवार, भाला, फरसा, ढाल और तीर-कमान जैसे शस्त्रों का उल्लेख मिलता है। दशहरे पर इनकी पूजा को शक्ति, साहस और धर्म की रक्षा की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। इन शस्त्रों को एक हजार वर्ष से अधिक पुराना बताया गया है। हालांकि, उनकी वास्तविक आयु की स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है। इसलिए इन्हें प्राचीन शस्त्र कहना उचित है, जबकि उनकी निश्चित उम्र की पुष्टि बाकी है।
आस्था और विरासत का अनूठा संगम
रायपुर का कंकाली मठ उन धार्मिक स्थलों में शामिल है, जिनकी पहचान उनकी विशिष्ट परंपराओं से बनी है। साल में एक बार पट खुलना, नागा साधुओं की स्मृतियां, समाधियों की परंपरा और दशहरे पर शस्त्र पूजा इसे विशेष बनाते हैं।
आज सुबह से दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु इस बात की झलक पेश करते हैं कि आधुनिक शहर के बीच भी पुरानी धार्मिक परंपराएं लोगों की आस्था से गहराई से जुड़ी हुई हैं। कंकाली मठ का इतिहास केवल एक मंदिर की कहानी नहीं, बल्कि रायपुर की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।




