अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस विशेष, बाघ संरक्षण में देश आगे, लेकिन छत्तीसगढ़ में क्यों हार रहा जंगल का राजा?

एक ओर तस्करों पर कार्रवाई, दूसरी ओर बीजापुर का घायल बाघ अब भी कैद… संरक्षण के दावों पर कई सवाल
रायपुर। 29 जुलाई को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मना रही है। केंद्र सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत आज दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघों का घर है। वर्ष 2022 की गणना के अनुसार देश में 3,682 बाघ हैं और भारत बाघ संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व कर रहा है। देश में 58 टाइगर रिजर्व, आधुनिक कैमरा ट्रैप, एम-स्ट्राइप्स जैसी तकनीक और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की वैज्ञानिक रणनीतियों ने संरक्षण को नई दिशा दी है।
बाघ दिवस के दिन ही खाल बेचते पकड़ाए
केंद्र सरकार की उपलब्धियों के बीच छत्तीसगढ़ की तस्वीर कई सवाल खड़े करती है। बाघ दिवस के दिन ही सूरजपुर में वन विभाग और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) की संयुक्त कार्रवाई में बाघ की खाल की तस्करी करने वाले तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। कार्रवाई में बाघ की खाल, पैंगोलिन की खाल और हथियार बरामद किए गए। यह कार्रवाई बताती है कि राज्य में वन्यजीव तस्करी का नेटवर्क अब भी सक्रिय है।

बीजापुर टाइगर की कहानी बनी संरक्षण व्यवस्था पर सवाल
इसी बीच बीजापुर के घायल बाघ की कहानी फिर चर्चा में है। मार्च 2025 में बीजापुर के जंगल में शिकारियों के लगाए फंदे में फंसकर गंभीर रूप से घायल हुए बाघ को रेस्क्यू कर रायपुर जंगल सफारी लाया गया था। कई महीनों के इलाज और सर्जरी के बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों ने उसे लगभग पूरी तरह स्वस्थ बताया। रिपोर्ट में उसके सामान्य रूप से चलने, दौड़ने और शिकार करने की क्षमता लौटने का उल्लेख किया गया।
इसके बावजूद सात महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बाघ को जंगल में नहीं छोड़ा गया। वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि यदि वह स्वस्थ है तो वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत सॉफ्ट रिलीज की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए।
विडंबना यह भी…जिस बीजापुर-नारायणपुर क्षेत्र में कभी 10 से अधिक बाघों की मौजूदगी बताई जाती थी, वहीं हाल के महीनों में कई बाघों के शिकार की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसे में एक ओर स्वस्थ बाघ कैद में है, दूसरी ओर जंगल में बाघों की सुरक्षा चुनौती बनी हुई है।
सबसे बड़ा सवाल: भारत वैश्विक स्तर पर बाघ संरक्षण का नेतृत्व कर रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ में अब भी कई सवाल अनुत्तरित हैं
- क्या घायल होकर स्वस्थ हो चुके बाघों की समयबद्ध पुनर्वापसी के लिए स्पष्ट नीति है?
- क्या वन्यजीव तस्करी रोकने के लिए पर्याप्त निगरानी व्यवस्था है?
- क्या बाघों के प्राकृतिक आवास और कॉरिडोर पर्याप्त सुरक्षित हैं?
- क्या राज्य में संरक्षण और पुनर्वास की प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी होनी चाहिए?
संरक्षण का अर्थ केवल संख्या नहींविशेषज्ञ मानते हैं कि बाघ संरक्षण केवल बाघों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, शिकार पर नियंत्रण, घायल वन्यजीवों का वैज्ञानिक पुनर्वास और उन्हें समय पर जंगल में लौटाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर छत्तीसगढ़ के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या जंगल का राजा अपने ही जंगल में सुरक्षित है, या संरक्षण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अब भी बड़ा अंतर मौजूद है?




