छत्तीसगढ़

Bodhghat Project :बोधघाट सिंचाई परियोजना का विरोध, 45 साल से क्यों अटकी है बोधघाट परियोजना? विकास बनाम विस्थापन की जंग

जगदलपुर। बस्तर की बहुप्रतीक्षित बोधघाट बहुउद्देशीय सिंचाई एवं जलविद्युत परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। राज्य सरकार इसे बस्तर के विकास का आधार बता रही है, लेकिन दूसरी ओर आदिवासी समाज, प्रभावित ग्रामीण और कई जनप्रतिनिधि इसके विरोध में खड़े हैं। यही विरोध पिछले करीब 45 वर्षों से इस परियोजना के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

इंद्रावती नदी पर दंतेवाड़ा जिले के बारसूर क्षेत्र के पास प्रस्तावित इस परियोजना को पहली बार 1979-80 में स्वीकृति मिली थी। इसके तहत सिंचाई, बिजली उत्पादन और पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। सरकार का दावा है कि इससे लाखों हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी, बिजली उत्पादन बढ़ेगा और बस्तर के विकास को गति मिलेगी।

आखिर विरोध क्यों?

परियोजना के विरोध की सबसे बड़ी वजह विस्थापन और डूब क्षेत्र है। विभिन्न अध्ययनों और आंदोलनकारी संगठनों के अनुसार बांध बनने से करीब 56 से 57 गांव प्रभावित होंगे, जिनमें अधिकांश आदिवासी आबादी वाले गांव हैं। हजारों परिवारों को अपनी जमीन, घर और जंगल छोड़ने पड़ सकते हैं। प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि उनकी आजीविका खेती, वनोपज और जंगलों पर निर्भर है, इसलिए केवल आर्थिक मुआवजा उनके नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता।

जंगल और पर्यावरण की चिंता

आदिवासी संगठनों का आरोप है कि परियोजना के कारण हजारों हेक्टेयर भूमि और बड़े वन क्षेत्र के जलमग्न होने की आशंका है। इससे जैव विविधता, वन संसाधनों और पारंपरिक जीवनशैली पर गंभीर असर पड़ेगा। आंदोलनकारी यह भी दावा करते हैं कि बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई होगी और पर्यावरणीय नुकसान दीर्घकालिक होगा।

ग्राम सभा की सहमति का मुद्दा

विरोध का एक बड़ा कानूनी आधार भी है। प्रभावित गांव अनुसूचित क्षेत्रों में आते हैं, जहां पेसा कानून (PESA) और वन अधिकार अधिनियम (FRA) लागू हैं। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि परियोजना से जुड़े सर्वेक्षण और प्रक्रियाएं ग्राम सभाओं की पूर्ण सहमति के बिना आगे बढ़ाई जा रही हैं। उनका कहना है कि संविधान और कानून आदिवासी समुदायों को उनकी जमीन और संसाधनों पर निर्णय का अधिकार देते हैं।

भाजपा नेताओं का भी विरोध

परियोजना का विरोध केवल सामाजिक संगठनों तक सीमित नहीं रहा। समय-समय पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी प्रभावित ग्रामीणों की चिंताओं का समर्थन किया है। बस्तर क्षेत्र में कई जनप्रतिनिधि खुले तौर पर यह मांग करते रहे हैं कि विस्थापन, पुनर्वास और ग्राम सभा की सहमति जैसे मुद्दों का समाधान किए बिना परियोजना आगे नहीं बढ़ाई जानी चाहिए।

सरकार का पक्ष

राज्य सरकार का कहना है कि बोधघाट परियोजना से बस्तर में सिंचाई का दायरा बढ़ेगा, बिजली उत्पादन होगा, पेयजल उपलब्धता सुधरेगी और रोजगार के अवसर पैदा होंगे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने हाल ही में केंद्र सरकार से इस परियोजना को शीघ्र स्वीकृति देने और राष्ट्रीय महत्व की परियोजना के रूप में आगे बढ़ाने का आग्रह भी किया है।

विकास और अधिकारों के बीच फंसी परियोजना

बोधघाट परियोजना की कहानी केवल एक बांध की नहीं, बल्कि विकास और विस्थापन के बीच संतुलन की चुनौती की कहानी है। एक ओर सरकार इसे बस्तर की तस्वीर बदलने वाला प्रोजेक्ट बता रही है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज अपनी जमीन, जंगल और पहचान बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। यही कारण है कि चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह परियोजना आज तक जमीन पर नहीं उतर सकी है

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CG Bulletin Desk1

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